(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

शान्तिपर्व (Mahabharat) - 12. शान्तिपर्व(महाभारत)


॥ श्रीः ॥
12.129. अध्यायः 129
Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Topics
यमेन गौतमंप्रति मातापित्रोः परिचर्यायास्तदृणापनोदनोपायत्वकथनम्॥ 1॥


Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Text

युधिष्ठिर उवाच। 12-129-0x(5704)(69874)
नामृतस्येव पर्याप्तिर्ममास्ति ब्रुवति त्वयि।
[यथाहि स्वात्मवृत्तिस्थस्तथा तृप्तोऽस्मि भारत॥] 12-129-1(69875)
तस्मात्कथय भूयोऽपि त्वं ममेह पितामह।
[न हि तृप्तिमहं यामि पिबन्धर्मामृतं हि ते॥] 12-129-2(69876)
भीष्म उवाच। 12-129-2x(5705)
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम्।
गौतमस्य च संवादं यमस्य च महात्मनः॥ 12-129-3(69877)
पारियात्रं गिरिं प्राप्य गौतमस्याश्रमो महान्।
वसते गौतमो यत्र तपसा दग्धकिल्विषः॥ 12-129-4(69878)
पृष्टिं वर्षसहस्राणि सोऽतप्यद्गौतमस्तपः।
तमुग्रतपसा युक्तं भावितं सुमहामुनिम्॥ 12-129-5(69879)
उपयातो नरव्याघ्र लोकपालो यमस्तदा।
तमपश्यत्सुतपसमृषिं वै गौतमं तदा॥ 12-129-6(69880)
स तं विदित्वा ब्रह्मर्षियेममागतमोजसा।
प्राञ्जलिः प्रणतो भूत्वा उपसृप्तस्तपोधनः॥ 12-129-7(69881)
तं धर्मराजो दृष्ट्वैव नमस्कृत्य द्विजोत्तमम्।
न्यमन्त्रयत धर्मेण क्रियतां किमिति ब्रुवन्॥ 12-129-8(69882)
गौतम उवाच। 12-129-9x(5706)
मातापितृभ्यामानृण्यं किं कृत्वा समवाप्नुयात्।
कथं च लोकानाप्नोति पुरुषो दुर्लभाञ्शुभान्॥ 12-129-9(69883)
यम उवाच। 12-129-10x(5707)
तपः शौचवता नित्यं सत्यधर्मरतेन च।
मातापित्रोरहरहः पूजनं कार्यमञ्जसा॥ 12-129-10(69884)
अश्वमेधैश्च यष्टव्यं बहुभिः स्वाप्तदक्षिणैः।
तेन लोकानवाप्नोति पुरुषोऽद्भुतदर्शनान्॥ ॥ 12-129-11(69885)

इति श्रीमन्महाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मपर्वणि एकोनत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः॥ 129॥

Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Footnotes

12-129-1 पर्याप्तिरलंभावस्तृप्तिरिति यावत्॥ 12-129-8 न्यमन्त्रयत तं सुमुखीकृतवान्॥ 12-129-11 अश्वमेधैरिति स्वधर्ममात्रस्योपलक्षणम्॥


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